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Thursday, 30 April 2020

शुभकामना

जीवन में हर पल, आगे बढ़ना।
कभी भी पीछे मुड़कर न देखना,
क्योंकि आगे बढ़ना ही जीवन है,
रुकना तो मौत की निशानी है।
संघर्ष तो जीवन में सबके होता है,
डर के उससे क्या कोई रोता है ?
प्रकृति का नियम है कि
वह हर पल बदलती है।
इसी तरह दुखों की कड़ी
धूप भी इक दिन,
सुख की शीतल छांव में ढलती है।
मेरी यही कामना,
सभी के प्रति समर्पित यह भावना
जीवन आपका जगमगाता रहे,
आशाओं के दीप से।
राहों में बिछे खुशियों के सुमन,
आंसू बन जाए मोती सीप के।
                             राजेश्री गुप्ता

मैं

मैं कौन हूं  ?
ये मैं ना जानूं
ये मैं क्या है ?
ये मैं ना जानूं।
जीवन का पल,
कहां खत्म होगा।
उसमें मैं होगा,
या ना होगा।
मैं है, या नहीं है।
ये मुझमें है या उसमें है।
लेकिन ये मैं है,
बड़ा अभिमानी।
इसके पीछे पडके,
दुनिया है हारी।
रावण और कंस है,
इसकी दास्तां।
कवियों ने कही है,
इसकी खलिस्ता।
हर शहर,हर डगर पर।
ये मैं है।
हर इंसान में, दुबका हुआ।
किसी कोने में, सिकुड़ा हुआ।
ये मैं है।
इसकी दास्तां ,
हर इक मुखाफित है।
रात हो या दिन हो,
हर पल का चित है।
ऐसा ये मैं है।
ऐसा ये मैं है।
              राजेश्री गुप्ता

रिश्ते

रिश्ते भी मजबूत हुआ करते हैं
पानी के बुलबुलों की तरह।
                            राजेश्री गुप्ता

झूठ



झूठ भी एहसास हुआ करते हैं
सच से ज्यादा ताकतवर हुआ क‌रते है
कभी यही झूठ बहला देते है मन को
अंधेरे में जो इक दीया सा दिखा देते हैं
सच तो केवल कड़वाहट देता है
जीते जी नहीं केवल मरने के बाद साथ देता है
झूठ के दम पर माना दुनिया नहीं टिकती
फिर भी ये झूठ एहसास हुआ करते हैं
मन को मन से बांधने के लिए
साथ दिया करते हैं।
                           राजेश्री गुप्ता

Tuesday, 28 April 2020

घर

कितने जतन कर मैंने घर बनाया
उसी घर का हर एक कोना सजाया
महंगें से महंगा सामान भी मंगवाया
किंतु विडंबना देखो
जिस घर को बनाने के लिए 
पल-पल मरती रही मैं
उसी घर में निरंतर रहना
दुश्वार हो गया है।
मानव मन घर से ज्यादा
बाहर भटकने को आतुर हो गया
वहीं घर जो मैंने
इतने परिश्रम से बनाया
मुझे रास नहीं आ रहा है
न जाने क्यों ये मन
बाहर गली - चौबारे ढूंढ रहा है
यही विडंबना है मानव मन की
नासमझ मन जान ही नहीं पाता
उसे बंधन नहीं स्वतंत्रता चाहिए
वहीं स्वतंत्रता जो उसे
घर से बाहर निकल कर
प्राप्त होती है।
                    राजेश्री गुप्ता

चेहरा

भीड़ का कोई चेहरा नहीं होता,
बाढ़ की कोई शक्ल नहीं होती।
भीड़ और बाढ़ दोनों का मंजर
अक्सर नजर आता है 
उनके गुजरने के बाद
उनके प्रवाह में सब 
सब ढह जाता है
खिलखिलाता उपवन
श्मशान बना जाता है
सब तरफ,उ‌दासी का,
वीरानियों का अंजाम 
नज़र आता है।
भीड़ और बाढ़ की स्थिति
एक ही सी होती है।
दोनों का कोई नाम नहीं,
किस लहर ने आघात किया,
इसका कोई साक्षी नहीं,
दोनों ले डुबते है।शहर, गांव को
मुखौटा लगाकर, भीड़ और बाढ़ का।
क्योंकि भीड़ का कोई चेहरा नहीं होता,
बाढ़ की कोई शक्ल नहीं होती।।
                                    राजेश्री गुप्ता