Tuesday, 28 April 2020

घर

कितने जतन कर मैंने घर बनाया
उसी घर का हर एक कोना सजाया
महंगें से महंगा सामान भी मंगवाया
किंतु विडंबना देखो
जिस घर को बनाने के लिए 
पल-पल मरती रही मैं
उसी घर में निरंतर रहना
दुश्वार हो गया है।
मानव मन घर से ज्यादा
बाहर भटकने को आतुर हो गया
वहीं घर जो मैंने
इतने परिश्रम से बनाया
मुझे रास नहीं आ रहा है
न जाने क्यों ये मन
बाहर गली - चौबारे ढूंढ रहा है
यही विडंबना है मानव मन की
नासमझ मन जान ही नहीं पाता
उसे बंधन नहीं स्वतंत्रता चाहिए
वहीं स्वतंत्रता जो उसे
घर से बाहर निकल कर
प्राप्त होती है।
                    राजेश्री गुप्ता

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