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Saturday, 30 May 2020

छात्र शक्ति का दुरुपयोग

छात्र शक्ति का दुरुपयोग
यूनान, मिस्र, रोम सब, मिट गए जहां से।
बाकी अभी तलक है, नामोनिशान हमारा।
सच कहा है कवि ने कुछ तो बात है हममें, हमारे देश में और वह बात है, हमारी सभ्यता, हमारी संस्कृति, जिसका संवर्धन, हम अपने छात्रों के मार्फत कर रहे हैं और उनकी शक्ति को सकारात्मक दिशा देकर गतिशील कर रहे हैं।
किसी भी राष्ट्र का विद्यार्थी वर्ग उसकी सुकुमारता एवं यौवन का प्रतीक हुआ करता है। राष्ट्र -मन उसी के साथ घुटनों के बल रेंगा खेला- कूदा, मुस्कुराया और खिलखिलाया करता है।
राष्ट्रीय चेतना इन्हीं पर अपनी दृष्टि केंद्रित करके वर्तमान में जिया और भविष्य के सपने देखा करती है।
छात्र, समाज के उस स्तंभ की तरह होते हैं, जिस पर समाज का भव्य महल खड़ा होता है। समाज का यह वर्ग, असंतुष्ट होकर अनेक महान कार्यों को अंजाम दे सकता है। यह वर्ग अपनी शक्ति के बलबूते राष्ट्र को एक नई दिशा दे सकता है।
भारत में छात्र शक्ति का दुरुपयोग कर पाना एक बड़ी बात है। यह दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है कि छात्र शक्तियां नष्ट हो जाती है। बहुत से छात्रों को पढ़ लिख कर भी बेकारी झेलनी पड़ती है। ऐसे छात्र तब अपना ध्यान विनाशात्मक  गतिविधियों पर केंद्रित कर अपनी शक्ति का दुरुपयोग करने लगते हैं।
जब नाश मनुज पर छाता है,
पहले विवेक मर जाता है।
ये छात्र कभी किसी आतंक गिरोह में शामिल होकर बेकसूर नागरिकों की हत्या करते हैं, तो कभी आत्मघाती दस्ता बनकर दूसरों के साथ- साथ स्वयं को भी खत्म कर देते हैं।
कभी यह हिंसक ढंग से समाज सुधार का कार्य करने की चेष्टा करते हैं, जिससे अंततोगत्वा समाज को ही क्षति होती है। भटके हुए छात्र अपनी शक्ति का प्रयोग चुनाव के समय बूथ लूटने में करने लगते हैं तो लोकतंत्र खतरे में पड़ जाता है। ये छात्र अपनी शक्ति का प्रदर्शन पुलिस वालों को मारने, आतंक मचाने के रूप में कर राष्ट्र को कमजोर करते हैं।
भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति की अनदेखी कर हमारे बहुत से छात्र पश्चिमी सभ्यता एवं संस्कृति की नकल कर रहे हैं। हमारे छात्रों में शारीरिक शक्ति की कमी नहीं है परंतु वह मानसिक दिवालियेपन का शिकार होकर अपनी ही जड़ों को काटते हुए दिखाई देते हैं।
छात्र-छात्राओं के जीवन में अश्लीलता का समावेश हो गया है। वे अनुशासन हीन हो गए हैं। इनमें नशा करने की प्रवृत्ति बढ़ रही है जबकि बहुत से छात्रों को सुख-सुविधाओं की भरमार है।
छात्रों पर पारिवारिक नियंत्रण नहीं रह गया है इसलिए उनकी उद्दंडता और बढ़ गई है। हमारी छात्रशक्ति परीक्षाओं में नकल करने में यकीन रखती है। उन्हें भारतीय पर्व त्योहारों की अपेक्षा 'वैलेंटाइन डे' अधिक प्यारा लगता है।
हम छात्र शक्ति को देश के विकास में भागीदारी करने का अवसर देने में विफल हो रहे हैं। हमारी छात्र शक्ति कर्तव्य हीन होकर अपनी ही क्षुद्र गतिविधियों में कैद है। छात्र शक्ति को नियोजित करने की आवश्यकता दिनों दिन बढ़ती जा रही है।
यह विचारणीय विषय है कि हमारे छात्रों के समक्ष कौन-कौन से आदर्श है? यदि छात्रों का आदर्श यह है कि अधिकाधिक सुख-सुविधाओं के साधनों को किसी भी तरह से प्राप्त किया जाए तो फिर भगवान ही मालिक है किंतु वर्तमान का सच यही है कि छात्र कम से कम समय में अधिक से अधिक पाने की लालसा रखता है। उसे अपने जीवन में सब कुछ बहुत जल्दी प्राप्त करना होता है। कम समय में आसमान छूने की उसकी सोच उसे गलत कार्य करने के लिए प्रेरित करती है।
एकल परिवार के कारण इन बच्चों पर ना तो दादा दादी का साया होता है ना ही परिवार के किसी अन्य सदस्य की देखरेख। माता- पिता दोनों के कार्य पर चले जाने के कारण बालक दिन भर घर में खुद को अकेला पाता है। यही कारण है कि वह टीवी, कंप्यूटर, मोबाइल आदि की कैद में खुद को जकड़ा हुआ पाता है। इन सब का उसके कोमल मस्तिष्क पर इतना असर होता है कि या तो वह आक्रामक बनता है या असभ्य।
जहां उसे एक आदर्श नागरिक बनने की तालीम मिलनी चाहिए थी, वहां उसका बचपन हिंसा मारधाड़ गंदी अश्लील फिल्में देखने में व्यतीत होता है। बच्चा महात्मा गांधी को नहीं माइकल जैक्सन को पसंद करने लगता है। शिवाजी की कथाएं उसे रास नहीं आती। स्वतंत्रता सेनानी उसके आदर्श नहीं रह जाते बल्कि ओसामा बिन लादेन को वह अपना प्रेरणास्रोत मानने लगता है।
छात्र शक्ति का दुरुपयोग राजनीति में भी बखूबी हो रहा है। वर्तमान राजनीतिज्ञ अपने क्षुद्र स्वार्थ के लिए छात्र शक्ति को बहका कर उसे गलत रास्ता दिखा रहे हैं ।हिंसात्मक गतिविधियों के लिए छात्रों का प्रयोग आम हो गया है। प्रदर्शन करना, नारे लगाना, लूटपाट करना, लोगों को डराना आदि के लिए इन्हीं छात्रों का प्रयोग किया जाता है। उन्हें सब्जबाग दिखाकर उनके भविष्य को अंधकार में घसीटा जा रहा है।
हमारा देश प्रगति के रथ पर रथारुढ़ है। उसे और आगे ले जाने का कार्य इन्हीं छात्रों का है। यदि इनकी शक्ति को नियोजित किया जाए तो यकीनन हमें जीतने से कोई नहीं रोक सकता, हमें आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता, हमारा देश फिर से सोने की चिड़िया बन सकता है।
देव देव है,दनुज-दनुज ही
किंतु दोनों ओर जा सकते हैं, मनुज ही।
                                            राजेश्री गुप्ता

Friday, 29 May 2020

मीठे वचनों की सार्थकता

मीठे वचनों की सार्थकता
पोथी पढ़ी- पढ़ी जग मुआ,
पंडित भया न कोय।
ढाई आखर प्रेम का,
पढ़े सो पंडित होय।।
कबीर जी तो बहुत पहले ही बता गए थे कि पोथी पढ़- पढ़ कर कोई विद्वान नहीं बनता। जिसने ढाई अक्षर प्रेम का सीख लिया, वही पंडित बन जाता है अर्थात प्रेम में बहुत शक्ति होती है। प्रेम से बड़ी से बड़ी नफरत को भी मिटाया जा सकता है। कबीर जी ही नहीं हर विद्वान व्यक्ति प्रेम की महत्ता को स्वीकार करता है। हम बहुत पढ़ लिख ले पर यदि हम ठीक ढंग से किसी से बात ही नहीं करें, तो हमारी इतनी पढ़ाई लिखाई व्यर्थ ही है ।शिक्षा हमें प्रेम सिखाती है, सभी से प्रेम पूर्वक व्यवहार करना सिखाती है, हर व्यक्ति को सम्मान देना सिखाती है।
मैं ऐसा मानती हूं कि हम सभी जो इस धरती पर विचर रहे हैं। मनुष्य, पशु- पक्षी पेड़- पौधे सभी प्रेम के भूखे होते हैं।
हम प्रायः घरों में देखते हैं कि एक छोटे बच्चे को जिससे
 अधिक प्रेम मिलता है ,वह उसी की ओर आकर्षित होता है। ‌उसी से उसका तालमेल अधिक हो जाता है ।पालतू पशु- पक्षी भी प्रेम की ही भाषा समझते हैं। वे भी जानते हैं कि कौन उनसे कितना प्रेम करता है।
 किसी जनजाति में अगर पेड़ को काटना होता था तो उस जनजाति के लोग उस पेड़ के इर्द-गिर्द खड़े होकर उसे कोसना शुरू कर देते थे जिसके बाद वह पेड़ अपने आप ही सूख जाता था यह सभी उदाहरण हमें बताते हैं कि प्रेम इस भावना से सभी प्रभावित होते हैं।
मनुष्य अपनी सद्भावना ओं का अधिकांश प्रदर्शन वचनों द्वारा ही किया करता है। मधुर वचन, प्रेम भरे वचन मीठी औषधि के समान लगते हैं, तो कड़वे वचन तीर के समान चुभते हैं।
जो व्यक्ति प्रेम भरे बोल नहीं बोलता वह अपनी ही वाणी का दुरुपयोग करता है। ऐसा व्यक्ति संसार में अपनी प्रतिष्ठा खो बैठता है तथा अपने जीवन को कष्टकारी बना लेता है। कटु वचनों के कारण उसका बनता काम बिगड़ जाता है। वह प्रतिपल अपने विरोधियों व शत्रुओं को जन्म देता है। ऐसे व्यक्ति को सदा अकेलापन झेलना पड़ता है तथा मुसीबत के समय लोग उनसे मुंह फेर लेते हैं।
कोयल काको देत है, कागा कासो लेत।
तुलसी मीठे वचन से, सबका मन हर लेत।।
अर्थात ना तो कोयल किसी को कुछ देती है, ना तो कौआ किसी से कुछ लेता है। बस कोयल अपनी मीठी वाणी की वजह से ही  सबके मन को प्रसन्न कर लेती है अतः मीठे वचन, प्रेम से बोली गई वाणी को सुनकर सबका ह्रदय खिल उठता है।
जिस प्रेम भरी वाणी या प्रेम से सभी के ह्रदय में प्रेम उपजता है, उससे निर्धन भी कैसे अछूता रह सकता है ।निर्धन या गरीब व्यक्ति धन से विपन्न होता है । ऐसे में यदि कोई उससे कटु वचन कहें , नफरत करें, अशिष्ट आचरण करें तो उसके दिल को पीड़ा पहुंचती है। प्रायः देखा गया है कि अमीर वर्ग, गरीब वर्ग का शोषण करता है ,उसे अपमानित करता है ।जिससे वर्ग भेद की एक बड़ी समस्या का सामना हमारा समाज कर रहा है। जो निर्धन धन का मारा है। दो वक्त का भोजन भी जुटा नहीं पाता। समाज के संपन्न वर्ग से भी दुत्कारा  जाता है। ऐसा निर्धन व्यक्ति धन नहीं चाहता। वह केवल इतना चाहता है कि भले ही उसे रोटी ना मिले पर समाज का संपन्न वर्ग उससे प्रेम से पेश आएं। वह रोटी का भूखा नहीं है। वह प्रेम का, सम्मान का भूखा है। उसे अगर वह प्रेम, वह सम्मान प्राप्त हो गया तो उसकी क्षुधा अपने आप शांत हो जाएगी।
वशीकरण एक मंत्र है, तज दे वचन कठोर।
तुलसी मीठे वचन ते, सुख उपजत चहुं ओर।।
प्रेम भरी वाणी के कारण जहां सरोजनी नायडू भारत की कोकिला कहलाई। वहीं पर महात्मा गांधी जी संपूर्ण देश के पिता बन गए। महात्मा बुद्ध के प्रेम ने अंगुलिमाल को संत बना दिया तो शबरी के प्रेम ने राम को उसके झूठे बेर खाने के लिए विवश कर दिया। तुलसी के प्रेम ने राम को पा लिया तो मीरा के प्रेम ने उसे श्रीकृष्ण से मिला दिया।
प्रेम का बंधन अनूठा है। इसमें इतनी शक्ति है कि स्वयं ईश्वर को भी धरती पर अवतरित होना पड़ता है।अंत:
ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोए।
औरन को शीतल करै, आपहुं शीतल होय।।
                                                 राजेश्री गुप्ता

Thursday, 28 May 2020

आधुनिक स्त्री सक्षमीकरण

आधुनिक स्त्री सक्षमीकरण
ढोल, गंवार, शुद्र, पशु, नारी,
सब है ताड़न के अधिकारी।
एक काल में ऐसा कहने वाले कवि आज होते तो शायद उन्हें अपने कहने पर पछतावा होता।
जब स्त्री जाति को अबला कहा जाता है तो निश्चित ही यह कथन उनकी दयनीय स्थिति को बयान करता दिखाई देता है। क्या स्त्रियां सचमुच दया के योग्य है?
क्या ईश्वर ने स्त्रियों को सचमुच अबला रूप में उत्पन्न किया है? यह सवाल समाज में लंबे समय से उठाए जा रहे हैं।
स्त्रियों की शरीर रचना में पुरुषों जैसी कठोरता नहीं है क्योंकि प्रकृति ने उसे सौंदर्य का प्रतीक मानकर शारीरिक कोमलता प्रदान की है। वही कोमल, अबला स्त्री ने वर्तमान परिप्रेक्ष्य में स्वयं को हर कार्य के लिए सक्षम सिद्ध किया है।
आज की नारी अर्धांगिनी नहीं बल्कि पूर्णांगिनी है और इस तथ्य को वह विविध रूपों में सिद्ध कर चुकी है। वर्तमान समय में ऐसा कोई क्षेत्र नहीं बचा है, जहां नारी का पदार्पण ना हो चुका हो। आज की नारी सर्वसामान्य पदों से लेकर उच्चतम पदों पर आसीन होकर अपने दायित्व का सफल निर्वाह कर रही है। उसकी सेवा और योग्यता किसी भी तरह से पुरुषों से कमतर नहीं है। आज की नारियां स्वच्छंद रूप से तथा अपने बलबूते उद्योग, व्यवसाय, कल कारखाने तथा अन्य प्रकार की व्यावसायिक गतिविधियों को पूरी दक्षता के साथ संचालित कर रही है।

नारी की शारीरिक शक्ति पुरुषों की तुलना में कम होने का मतलब यह नहीं कि वे कमजोर और अबला है। शारीरिक शक्ति कम होते हुए भी उन्हें धैर्य अधिक है। फलत: वे तनाव का कम शिकार होती हैं। पुरुषों की तुलना में स्त्रियां ह्रदय रोग से कम पीड़ित होती है।वे अहंकार और पद की दौड़ में नहीं लगी रहती।
मीराबाई ने प्रेम के मार्ग को चुनकर नारी स्वतंत्रता का एक अनोखा मार्ग दिखाया।
आज के युग में नारियों की भूमिका बदलती दिखाई दे रही है। वे सभी सामाजिक क्षेत्रों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए आतुर दिखाई दे रही हैैं। शिक्षा, स्वास्थ्य, कला, राजनीति, विज्ञान आदि दुनिया का कोई भी ऐसा क्षेत्र नहीं है, जहां स्त्रियों ने अपनी पहुंच न बनाई हो। अब तो पुलिस विभाग में भी महिलाएं हैं तथा सफलतापूर्वक कानून और व्यवस्था को संभाल रही हैं। इस क्षेत्र में महिला पुलिस अधिकारी किरण बेदी का नाम बड़े गर्व से लिया जाता है। भारतीय महिला इंदिरा गांधी का नाम दुनिया में कौन नहीं जानता ? जिन्होंने यह सिद्ध कर दिखाया कि सत्ता के शीर्ष पर महिलाएं उतनी ही सफल हैं। उनका एक लंबे समय तक भारतीय राजनीति में छाए रहना यह सिद्ध करता है कि नारियों में भी देश संचालन की क्षमता भरपूर है। सोनिया गांधी, सुषमा स्वराज, मेनका गांधी, बेनजीर भुट्टो, स्मृति ईरानी आदि कई ऐसे नाम है जिन्हें हम भूल नहीं सकते।
अस्पतालों से यदि नर्सों को हटा दिया जाए तो पूरी दुनिया की स्वास्थ्य सेवा तत्काल थप्पड़ जाएगी। मनोरंजन, उद्योग में स्त्रियों की भागीदारी को अनदेखा नहीं किया जा सकता। महिलाएं अंतरिक्ष अभियान में भी साझीदार बनी है। इन क्षमताओं को देखते हुए यह कैसे कहा जा सकता है कि अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी आंचल में है दूध, आंखों में पानी।
समाजशास्त्री कहते हैं कि नारी पुरुषों के साथ सहयोग करें तो ठीक है, लेकिन प्रतियोगिता करें, तो यह गलत है। आधुनिक नारी, पुरुषों से प्रतियोगिता नहीं कर रही। वह तो उसके कंधे से कंधा मिलाकर आगे बढ़ना चाहती है। जिससे परिवार, समाज, देश का विकास हो। देश के हित में अपना योगदान देना चाहती है। नृत्य, संगीत, कला, लेखन आदि क्षेत्रों में अपनी भूमिका को आगे बढ़ाना चाहती है।

आधुनिक नारी को नौकरी करने, अपना व्यवसाय करने, राजनीति में भाग लेने, घूमने- फिरने आदि की पूरी आजादी मिली हुई है। भारतीय संविधान में प्रदत्त अधिकारों के तहत को कुप्रथाओं का अंत कर दिया गया है। समाज की सोच भी स्त्रियों के बारे में उदार हुई है। परंतु सामाजिक परिवर्तनों का लाभ अधिकतर पढ़ी-लिखी महिलाएं ही उठा पा रही है। निर्धन, अशिक्षित तथा असहाय स्त्रियों का एक तबका आज भी अपने अधिकारों के बारे में अनभिज्ञ है।
सरकार द्वारा चलाए गए विभिन्न कार्यक्रम जैसे बेटी पढ़ी, प्रगति हुई। बेटी बचाओ, देश बचाओ। आदि के द्वारा नारी के सशक्तिकरण को और अधिक सशक्त बनाया जा सकता है।
आधुनिक स्त्री सक्षम है। हर कार्य को करने के लिए। वह केवल मंदिर की देवी बनकर नहीं रहना चाहती।
 उसने अपनी छवि बदली है। वह घर- बाहर की दोहरी भूमिका निभा रही है। उसे छोटा या ओछा कहना या कमजोर मानना, वर्तमान परिप्रेक्ष्य में सही नहीं है। आत्मरक्षा का कवच पहनकर वो कैब चलाती है, तो जहाज भी उड़ा लेती है।
उसने अपनी भूमिका में जो बदलाव लाया है, वह सराहनीय है। आधुनिक समय में उसकी  सक्षमता पर कोई प्रश्र चिन्ह नहीं लगा सकता। वह एवरेस्ट की चोटी पर तो अपने पांव रख ही आई है, चंद्रलोक की यात्रा भी कर आई है।
प्रसाद जी ने कहा है- 
नारी तुम केवल श्रद्धा हो,
विश्वास रजत नग पग तल में।
पीयूष स्रोत सी बहा करो,
जीवन के सुंदर समतल में।
                              राजेश्री गुप्ता

Monday, 25 May 2020

चांद

चांद
ए चांद कितना अच्छा है तू।
करवा चौथ और ईद,
दोनों के लिए आता है।
सिखा सकता है तो सिखा उनको,
मजहब के नाम पर जो दुकानें चलाते हैं।
धर्म के नाम पर भाई-भाई को लड़ाते हैं।
बता उनको कि तेरी चांदनी,
सब पर बरसती है।
तेरी रोशनी,
हर एक तक पहुंचती है।
अमीर- गरीब का फर्क तो,
तूने किया ही नहीं कभी।
ए चांद,
फलक पर तू सजता है।
अमावस को छोड़,
हर रोज निकलता है।
सब तुझे रोज देखते हैं,
फिर क्यों नहीं समझते हैं।
ए चांद,
मेरा भी, साथी है तू।
मेरी खिड़की से ,
ताका करती हूं तुझे।
रोज तेरे रूप को,
आका करती हूं मैं।
कभी छोटा, कभी बड़ा
और कभी और बड़ा हो जाता है तू।
लेकिन, अपने हर रूप से,
लुभाता है तू।
तुझे चाहने वाले,
इस दुनिया में बहुत हैं।
तुझ पर गीत और ग़ज़ल,
गाने वाले भी बहुत हैं।
सिर्फ, तू जो कहना चाहता है
वह लोगों को नहीं समझता।
समझाना चाहता है,
तो समझा,
करवा चौथ और ईद,
दोनों का है तू।
और यह भी बता
कि इस पूरी कायनात में
मानवता ही एक जाति है।
इंसानियत ही एक जज्बा है।
मानवता ही एक जाति है।
इंसानियत ही एक जज्बा है।
                            राजेश्री गुप्ता

Thursday, 21 May 2020

स्वार्थ

स्वार्थ
किसी ने मुझसे कहा कि आज खुद को हंसने के लिए औरों को रुलाना जरुरी हो गया है, नहीं तो संसार जीने नहीं देता और नाही उस व्यक्ति को बुद्धिमान समझता है।
          कभी से बैठकर यही सोच रही हूं कि क्या ये सही है ? आज स्वार्थ इतना फैला गया है कि लोग अपना दामन बचाने के लिए दूसरों पर कीचड़ लगाने से बाज़ नहीं आते। खुद का आंचल साफ,स्वच्छ रखने के लिए दूसरों के आंचल पर गंदगी लगा देते हैं। दूसरों के आंचल पर लगा पैबंद इन्हें खूब भाता है। दूसरों पर हंसना,उनका मजाक बनाना यही सब में ये मस्त रहते हैं।
          अपनी गलतियों को छुपाकर दूसरों को दोषारोपित करने में इन्हें बहुत रस मिलता है।हम ऐसी दुनिया में रहते हैं।
            क्या सचमुच ऐसी दुनिया में रहने के लिए चालाक होना ज़रूरी है ? केवल सहकर रहने वाला या रो कर रहने वाला जिंदगी नहीं जीता ? क्या खुद को सुखी रखने के लिए दूसरों को दुख देना ज़रूरी है?
            आदर्शों की दुनिया वास्तविक दुनिया से कितनी भिन्न है। अब भी मैं केवल स्वार्थ के बारे में ही सोच रहीं हूं। आप भी सोचिएगा। 
                                             राजेश्री गुप्ता

Sunday, 10 May 2020

संबंधों की जटिलता

संबंधों की जटिलता
संबंधों की जटिलता पर 
विचार करते हुए
ये प्रश्र आ गया
कि ये रिश्ता क्या है ?
हम क्यों इसे,
इतना महत्व देते हैं ?
क्यों इसकी गहराइयों को
समझने की कोशिश करते हैं ?
सुना था, रिश्ते पनपते हैं
स्नेह से।
पर कड़वाहट भी तो होती है
फिर क्यों हम उन रिश्तों को
लेकर चलते हैं ?
रिश्ते चाहे जो भी हो,
मां- बेटी का,बहन- भाई का
या पति-पत्नी का
सबमें स्नेह, सौहार्द होना आवश्यक है
और उससे भी आवश्यक है
विश्वास।
वह विश्वास जो कभी ना टूटे,
कभी ना छूटे
वह विश्वास जो रिश्तों को दृढ़ करें।
उसे सींचे,
पल्लवित करें पौधों सा।
पर सोचती हूं !
क्या ये विश्वास आज टिका है ?
और टिका भी है तो,
कितनों के बीच।
आज भी स्वार्थ की रेखाएं,
लांघ जाती है,कितनों को ?
वह चढ़ जाता है,
स्वार्थ की बलि ।
और विश्वास वही रह जाता है,
धरा का धरा।
फिर भी रिश्तों की डोर तो,
बंधी ही है विश्वास के सहारे।
या यूं कहें कि 
प्रेम और स्नेह के सहारे।
यह मोह माया का चक्कर है,
जो एक दूसरे को,
एक दूसरे से,
बांध कर रखता है
और शायद इसीलिए ही इस
रिश्तों की जकड़न में,
जकड़ती चली जा रही हूं मैं।
फिर भी सोचती हूं कि ये
रिश्ता क्या है ?
और क्यों है ?
क्यों मैं उसमें जकड़ती
चली जा रही हूं।
सिर्फ प्रेम और स्नेह तो नहीं है इसमें,
स्वार्थ, खुदगर्जी भी है इसमें ।
सबका स्वार्थ,सब से बंधा है।
मेरा स्वार्थ, उससे बंधा है।
क्या इसलिए रिश्ते निभाने चाहिए ?
या फिर मुझे उसे भूलाने चाहिए।
भुलाना तो मुश्किल है ?
पर क्यों ?
यह भी कहना मुश्किल है।
मेरा संदर्भ भी ,
क्या किसी और का भी 
हो सकता है ?
जैसे मैं विचलीत हूं
क्या कोई और भी 
हो सकता है ?
संबंधों की जटिलता का
प्रश्र है।
समझ से, कोसों दूर है।
फिर भी निभाना 
पड़ता है।।
               राजेश्री गुप्ता बनिया

Friday, 8 May 2020

आदमी

आदमी
महसूस किया है,इक सहर को
कि आदमी मोहताज नहीं है।
ईश्वर की इस कृति का, कोई सरोताज नहीं है।
चढ़ हिमालय पर उसने, साबित यही किया
कि अब वह कभी लाचार नहीं है।
पौरुष है उसके पास, है दिमाग भी इसलिए
संसार में जो उससे जीते,
वह आदमी अभी तैयार नहीं है।
ब्रह्मा को अपनी कृति पर नाज़ है बड़ा
इसलिए आदमी अवगुणों से भी भरा
अहंकार शिरोमणि का ताज भी गढ़ा
रावण भी इसलिए ही मरा ।
सर्वोत्तम पुरुषोत्तम राम है
इसलिए वह इंसान, इंसान हैं,
जो सद्गुणो की खान है।
                           राजेश्री गुप्ता बनिया

जिंदगी

जिंदगी
जिंदगी ने हमें जीना सिखाया,
जीते हुए भी लड़ना सिखाया।
वक्त का मरहम, भरता है जख्म।
ताज़ा हो तो, दुखता है जख्म।
इन सभी बातों का तकाजा,
वास्तविक रूप में हमें बताया,
जिंदगी ने हमें जीना सिखाया।
जानती हूं मैं, जिंदगी को करीब से
पल- पल की हंसी,पल-पल के ग़म में।
तराशा है मैंने, एक जौहरी सा
जिंदगी का कोई मुकाम मैंने खोया भी नहीं
खोकर भी मैंने कुछ पाया नहीं
ये हैं जिंदगी की कड़वी सच्चाई 
मरकर ही यहां, हर एक ने जन्नत है पायी।
जीवन में संघर्ष है, यहां पर सभी के
कोई हंस कर झेलता है, तो कोई रोकर
मगर जीवन की सार्थकता है,
तो सिर्फ दुख ढोकर।
ऐसा नहीं कि कभी,सुख ना आए
पर दुख से मन क्यों कतराता है,
बार- बार सुख पाने को ये मन
क्यों ललचा जाता है ?
लेकिन जीवन की यही सत्यता,
हर मनुष्य की यही विवशता,
कभी- कभी जी करता है,
जीवन से उठ जाने से,
मगर मौत के करीब आते ही,
वह प्यार करने लगता है जीवन से।
वह प्यार करने लगता है जीवन से।
                                       राजेश्री गुप्ता बनिया