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Sunday, 10 May 2020

संबंधों की जटिलता

संबंधों की जटिलता
संबंधों की जटिलता पर 
विचार करते हुए
ये प्रश्र आ गया
कि ये रिश्ता क्या है ?
हम क्यों इसे,
इतना महत्व देते हैं ?
क्यों इसकी गहराइयों को
समझने की कोशिश करते हैं ?
सुना था, रिश्ते पनपते हैं
स्नेह से।
पर कड़वाहट भी तो होती है
फिर क्यों हम उन रिश्तों को
लेकर चलते हैं ?
रिश्ते चाहे जो भी हो,
मां- बेटी का,बहन- भाई का
या पति-पत्नी का
सबमें स्नेह, सौहार्द होना आवश्यक है
और उससे भी आवश्यक है
विश्वास।
वह विश्वास जो कभी ना टूटे,
कभी ना छूटे
वह विश्वास जो रिश्तों को दृढ़ करें।
उसे सींचे,
पल्लवित करें पौधों सा।
पर सोचती हूं !
क्या ये विश्वास आज टिका है ?
और टिका भी है तो,
कितनों के बीच।
आज भी स्वार्थ की रेखाएं,
लांघ जाती है,कितनों को ?
वह चढ़ जाता है,
स्वार्थ की बलि ।
और विश्वास वही रह जाता है,
धरा का धरा।
फिर भी रिश्तों की डोर तो,
बंधी ही है विश्वास के सहारे।
या यूं कहें कि 
प्रेम और स्नेह के सहारे।
यह मोह माया का चक्कर है,
जो एक दूसरे को,
एक दूसरे से,
बांध कर रखता है
और शायद इसीलिए ही इस
रिश्तों की जकड़न में,
जकड़ती चली जा रही हूं मैं।
फिर भी सोचती हूं कि ये
रिश्ता क्या है ?
और क्यों है ?
क्यों मैं उसमें जकड़ती
चली जा रही हूं।
सिर्फ प्रेम और स्नेह तो नहीं है इसमें,
स्वार्थ, खुदगर्जी भी है इसमें ।
सबका स्वार्थ,सब से बंधा है।
मेरा स्वार्थ, उससे बंधा है।
क्या इसलिए रिश्ते निभाने चाहिए ?
या फिर मुझे उसे भूलाने चाहिए।
भुलाना तो मुश्किल है ?
पर क्यों ?
यह भी कहना मुश्किल है।
मेरा संदर्भ भी ,
क्या किसी और का भी 
हो सकता है ?
जैसे मैं विचलीत हूं
क्या कोई और भी 
हो सकता है ?
संबंधों की जटिलता का
प्रश्र है।
समझ से, कोसों दूर है।
फिर भी निभाना 
पड़ता है।।
               राजेश्री गुप्ता बनिया

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