Thursday, 21 May 2020

स्वार्थ

स्वार्थ
किसी ने मुझसे कहा कि आज खुद को हंसने के लिए औरों को रुलाना जरुरी हो गया है, नहीं तो संसार जीने नहीं देता और नाही उस व्यक्ति को बुद्धिमान समझता है।
          कभी से बैठकर यही सोच रही हूं कि क्या ये सही है ? आज स्वार्थ इतना फैला गया है कि लोग अपना दामन बचाने के लिए दूसरों पर कीचड़ लगाने से बाज़ नहीं आते। खुद का आंचल साफ,स्वच्छ रखने के लिए दूसरों के आंचल पर गंदगी लगा देते हैं। दूसरों के आंचल पर लगा पैबंद इन्हें खूब भाता है। दूसरों पर हंसना,उनका मजाक बनाना यही सब में ये मस्त रहते हैं।
          अपनी गलतियों को छुपाकर दूसरों को दोषारोपित करने में इन्हें बहुत रस मिलता है।हम ऐसी दुनिया में रहते हैं।
            क्या सचमुच ऐसी दुनिया में रहने के लिए चालाक होना ज़रूरी है ? केवल सहकर रहने वाला या रो कर रहने वाला जिंदगी नहीं जीता ? क्या खुद को सुखी रखने के लिए दूसरों को दुख देना ज़रूरी है?
            आदर्शों की दुनिया वास्तविक दुनिया से कितनी भिन्न है। अब भी मैं केवल स्वार्थ के बारे में ही सोच रहीं हूं। आप भी सोचिएगा। 
                                             राजेश्री गुप्ता

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