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Sunday, 21 June 2020

दुनिया

दुनिया


ये दुनिया है,

हर बात पर टोकती है।

बाप गधे पर बैठे,

या बेटा।

इन्हें हर बात में ऐब नजर आता है।

दुनिया का काम ही है,

लोगों पर नजर रखना।

कुछ तो ऐसे शागिर्द है,

डफली खूब बजाते हैं,

राग मधुर गाते हैं,

सबके जीवन में ताका- झांकी करना,

उसका- इससे, इसका- उससे,

बस यही है काम- धंधा।

आता है इन्हें, बहस- बाजी भी करना।

तू- तू, मैं- मैं कर, अपनी जंग जीतना।

किसी को भी नहीं बख्शते,

सभी को अपना पैबंद समझते।

लोग भी इनकी बातों में आ जाते,

ये चाशनी जो है टपकाते।

इनके पास है एक जादुई दूरबीन,

दूर तक देख पाते हैं।

आज तक मेरे जीवन में क्या नहीं हुआ,

यह मैं नहीं समझ पाई।

किंतु यह देख पाते हैं,

देख ही नहीं, समझ भी पाते हैं।

हमदर्दी इनको सभी से खूब होती है।

सोचती हूं, क्या यह नेता बनना चाहते हैं ?

राजनीति करना चाहते हैं ?

तब पता चला,

राजनीति तो सब ओर है।

यह बड़ी राजनीति नहीं करते,

इसलिए छोटी-छोटी करना चाहते हैं।

क्या कहूं इनसे,

कुछ समझ नहीं पाती।

आज तो हर तरफ,

सिर्फ गिद्ध ही देख पाती हूं।

जो मौकापरस्त होते हैं।

जो शव ढूंढते हैं।

ताकि नोच- नोच कर,

उसका ढांचा ही बिगाड़ दे।

दुनिया ऐसी ही है मतलबी, स्वार्थी।

सब अपना स्वार्थ साथ रहे।

ऐसे में कैसे कोई, अपनी व्यथा,

अपनों से कैसे कहें।

                            राजेश्री गुप्ता

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