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Saturday, 20 June 2020

विज्ञापन युग

विज्ञापन युग
लाइफ बाॅय है जहां तंदुरुस्ती है वहां,
निरमा निरमा निरमा वाशिंग पाउडर निरमा
थोड़ा सा पाउडर और झाग ढेर सारा आदि।
विज्ञापन दैनिक जीवन में छोटे से लेकर बड़े तक प्रभाव डालने वाला सशक्त माध्यम बन गया है। विज्ञापन के द्वारा विभिन्न कंपनियां अपने-अपने वस्तुओं की खपत बड़ी ही धूमधाम से कर रही है। पहले विज्ञापन टीवी या सिनेमाघरों में स्लाइड्स पर एक सूचना के रूप में दिखाया जाता था। जैसे-जैसे समय बदला विज्ञापन ने भी अपना रूप बदल लिया है। आकर्षक चित्रों के अलावा प्रभावी संवाद शैली व दोनों को मिलाकर विज्ञापन बनाया जाता है। विज्ञापन जितना प्रभावशाली होता है, वस्तु की खपत उतनी ही तेज होती है। विज्ञापन की प्रभावोत्पादकता इतनी है कि हम सर्फ की ललिता जी को कभी भूल ही नहीं सकते और ना ही भूल सकते हैं कि बूस्ट इज द सीक्रेट ऑफ माय एनर्जी।
विज्ञापन ने किया कमाल,
जिंदगी में हमारे भर दी रफ्तार।
सचमुच विज्ञापन छा गया है, हम पर, हमारी सोच पर, हमारी मानसिकता पर और क्यों ना छाए ? हम भी तो विज्ञापन युग में ही जी रहे हैं, सांस ले रहे हैं। विज्ञापन के द्वारा ही हमें पता चलता है कि लाइव बॉय के अलावा भी संतूर, लक्स, डेटॉल,सेवलाॅन आदि और भी साबुन है। वैसे ही टूथपेस्ट या बिस्किट आदि के बारे में भी हमें पता चलता है कि विभिन्न कंपनियों के द्वारा विभिन्न वस्तुएं बाजार में उपलब्ध है। कई बार समाचार पत्रों-पत्रिकाओं मे भी वस्तुओं के विज्ञापन में उसके उत्पादन से संबंधित कई बातें छपी होती है। जिससे आम व्यक्ति को वस्तु के बारे में बहुत सी जानकारी मिल जाती है। इतना ही नहीं कौन- सी वस्तु, किस जगह, कितनी सस्ती मिलेगी, यह बात भी हमें विज्ञापनों के द्वारा पता चलती है। जैसे- बिग बाजार, डी- मार्ट आदि का विज्ञापन।
विज्ञापन ने दुनिया रोशन कर दी,
हर व्यक्ति की मुश्किल आसान कर दी।
विज्ञापन ही हमें बताता है कि कौन- सी ब्रांड की कौन- सी वस्तु सस्ती है और कौन सी महंगी। तब हम अपनी रूचि के आधार पर वस्तुएं खरीद सकते हैं।
विज्ञापन ही बाजार जगत में हलचल पैदा कर देता है। वस्तु की मांग और पूर्ति के संदर्भ में विज्ञापन भी अपनी अहम भूमिका निभाता है।
उत्पादन को बाजार तक लाते हैं विज्ञापन,
उसकी खपत को बढ़ाता है विज्ञापन।
आज विज्ञापन का दौर है। ऐसे में विज्ञापन के द्वारा कई लोग दिशा भ्रमित भी होते हैं। उदाहरण लक्स साबुन का विज्ञापन देखकर कई लड़कियां खुद को ऐश्वर्या या प्रियंका समझने लगती है।गोरेपन की क्रीम का विज्ञापन देखकर लोग उसे खरीदते हैं और खुद को ठगा पाते हैं। विज्ञापन में वस्तुओं की इतनी तारीफ होती है कि ग्राहक सोचता है कि वह क्या खरीदें और क्या ना खरीदे। फल स्वरूप वह भ्रम में होता है।
विज्ञापन की चकाचौंध के, वश में सारा संसार,
भांति भांति के विज्ञापनों से, चलता है संसार।
छोटे बच्चे तो विज्ञापन देखकर उसी वस्तु को खरीदने की जिद करने लगते हैं। विवश माता- पिता वह वस्तु लेने को बेबस हो जाते हैं। टीवी में तो कार्यक्रम कम और विज्ञापन अधिक ही दिखाई देता है शायद इसीलिए हमें कविताएं कम और विज्ञापन ज्यादा याद होने लगते हैं। चर्चित हस्तियों को लेकर विज्ञापन दिखाए जाते हैं जिससे बच्चे ही नहीं बड़े भी यही सोचते हैं कि मेरा पसंदीदा अभिनेता यदि इस ब्रांड की वस्तुएं खरीदता है या उपयोग में लेता है तो मैं भी यही वस्तु का उपयोग करूंगा।
मैं जानती हूं हर सिक्के के दो पहलू होते हैं। फिर भी आधुनिक जीवन की इस यांत्रिक परिस्थितियों में विज्ञापन जरूरी हो गया है।
विज्ञापन युग की महिमा अपार, 
छोटे से बड़े तक सबको दिया तार।

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