Follow by Email

Saturday, 15 August 2020

स्वतंत्रता दिवस

स्वतंत्रता दिवस

तम से पर्दा छटा, रवि की रश्मियों ने संपूर्ण चेतना को प्रफुल्लित कर दिया। गुलामी की जंजीरों में जकड़े हुए भारत को बंधहीन कर दिया। तो ऐसा दिन भारत के इतिहास में अमर क्यों ना हो?
एक लंबे संघर्ष के बाद गुलामी की लौह श्रृंखलाओं से स्वतंत्र होकर आज हम स्वतंत्र भारत में स्वतंत्र सांसे ले रहे हैं। भारत में प्रगति और विकास की राह पर कई मील के पत्थर तोड़े हैं। अपना संविधान बनाना, तटस्थ विदेशी नीति बनाकर उस पर डटे रहना। शिक्षा, ज्ञान, विज्ञान, तकनीकी, उद्योग- धंधे ,कल- कारखाने सभी का स्वतंत्र भारत में असीम विस्तार हुआ है।
क्या हुआ गर मर गए,
अपने वतन के वास्ते,
बुलबुले भी तो मरती हैं,
अपने चमन के वास्ते।
देश प्रगति कर रहा है, आगे बढ़ रहा है किंतु संकट बार-बार पैरों में बेड़िया पहनाने आ ही जाते हैं ऐसे में जरूरी है कि हमारे देश को बचाने के लिए हम सभी  एक हो जाए। आज राष्ट्र कुछ जयचंदो की वजह से गर्त में डूबता जा रहा है। ये जयचंद सांप्रदायिक वैमनस्यता बढ़ाकर स्वार्थ के अहम में धर्म की दुकानें चला रहे हैं। वोट बैंक के लिए निरीह, मासूम जनता को स्वर्ग का हवाला देकर गुमराह कर रहे हैं। विध्वंसकता, कट्टरता की नींव पर अपने सपनों का महल खड़ा कर रहे हैं जिसकी दीवारें इंसानी खून में रंगी हो।
लेकिन हमें यह याद कर लेना होगा कि ऐसे महल बहुत जल्द ही खंडहर में तब्दील हो जाया करते हैं।


आतंकवाद किसी का दोस्त नहीं होता। इसका कोई मजहब नहीं होता। वह सिर्फ इंसानियत का दुश्मन होता है और इंसानियत तो हर मजहब, हर धर्म में होती है। अतः आज जरूरी है कि हम विदेशी राष्ट्रों से भी कुछ सीख ले।
देश में गरीबी, बेरोजगारी, महंगाई सुरसा के मुंह की तरह बढ़ती ही जा रही है, जिसका मूल कारण है,अशिक्षा।
देश को पूर्ण साक्षर बनाने की आवश्यकता है। सिर्फ विद्यार्थियों को परीक्षा प्रणाली से बांधने की बजाए क्यों ना हम शिक्षा के साथ उद्योग धंधों को बढ़ावा देने की बात पर जोर दें। जिससे विद्यार्थी न केवल साक्षर होगा बल्कि वह आत्मनिर्भर व स्वावलंबी भी होगा।
संदेश नहीं मैं यहां स्वर्ग का लाया,
इस पृथ्वी को ही स्वर्ग बनाने आया।


अतः आज का दिन हमें यही संदेश देता है कि हममें सच्चा प्रेम हो, त्याग हो, दया हो, सहानुभूति हो और हो कर्तव्य की भावना। आज का दिन ज्ञान की पावन ज्योति जगाने के व्रत लेने का है। स्वतंत्रता देवी के स्वागत में जगमगाते दीपक ओं के प्रकाश में अपने ह्रदय के अंधकार को धोकर भारत के कण-कण में कल्याण एवं शांति की हिलोर उठा देने का है जिससे सभी भारतवासी यथार्थ सुख का अनुभव करें। तभी नेहरू और गांधी जी का स्वप्न चरितार्थ होगा। वसुधैव कुटुंबकम हमारा जो धेय है वह पूर्ण होगा।
जो भरा नहीं है भावों से,
बहती जिसमें रसधार नहीं,
वह हृदय नहीं, वह पत्थर है,
जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।
राजेश्री गुप्ता

No comments:

Post a comment