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Thursday, 6 August 2020

शहरी जीवन

शहरी जीवन
चंदन है इस देश की माटी,
तपोभूमि सब ग्राम है।
कहते हैं-भारत गांवों में निवास करता है। गांव इस देश की रीढ़ की हड्डी है और देश की खुशहाली हमारे गांवों की मुस्कुराहट पर निर्भर है। बेशक यह बात शत- प्रतिशत सच है, परंतु फिर भी गांव के लोग शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। वे अपने गांव छोड़कर शहरों के आकर्षण की ओर खींचें जा रहे हैं।
हां ! हां ! भारत दुर्दशा न देखी जाए।
गांवों की शुद्ध आबोहवा शहरी लोगों को सदैव आकर्षित करती रहती है क्योंकि शहरों में बस, ट्रक, कार, दुपहियों और तिपहियों की इतनी भरमार है कि यहां का वायुमंडल अत्यधिक प्रदूषित हो गया है। शहरों में वायु प्रदूषण के अलावा ध्वनि प्रदूषण भी अत्यधिक है। इसके अतिरिक्त जल प्रदूषण भी है। गंदा पानी पीने के कारण शहर के अधिकांश लोग जल जनित बीमारियों जैसे बुखार, हैजा, दस्त, उल्टी आदि से हमेशा त्रस्त रहते हैं। ध्वनि प्रदूषण से शहरों में अधिकांश लोग बहरे हो गए हैं या कम सुनने लगे हैं और वायु प्रदूषण से लोगों को श्वास संबंधी बीमारियां हो गई हैं। यह सभी बीमारियां इन शहरों की ही देन है। फिर भी शहर में रहने का अपना आकर्षण बना हुआ है।
आज का शहर विचित्र, नवीन
धड़कता है हर पल,
चाहे रात हो या दिन।
शहरी जीवन प्रदूषण से बेहाल है, इसके बावजूद यहां की चमक दमक लोगों को अपनी ओर खींच रही है। यहां जीवन उपयोगी हर वस्तु सहज उपलब्ध हो जाती है। इसके अतिरिक्त शहरों में रोजगार के अवसर अधिक है इसलिए शहरों का अपना अलग ही आकर्षण है। हालांकि यहां पर लोग गांव की करो प्रेम और मेलजोल से नहीं रहते।
लोग संगमरमर हुए ,ह्रदय हुए इस्पात,
बर्फ हुई संवेदना, खत्म हुई सब बात।
जिस प्रकार गांव मे लोग एक-दूसरे की मदद के लिए हमेशा तैयार रहते हैं। प्रतिदिन सुबह-शाम वे चौपाल पर एक दूसरे के हाल-चाल अवश्य पूछते हैं ,लेकिन शहरों में तो अधिकांशतः लोग अपने पड़ोसी का नाम तक नहीं जानते। सिर्फ अपने मतलब से मतलब रखते हैं ऐसा प्रतीत होता है जैसे सभी अपने स्वार्थ पूर्ति के लिए वहां रह रहे हैं।
जहां भी जाता हूं ,वीरान नजर आता है ।
खून में डूबा हुआ ,हर मैदान नजर आता है।
हालांकि केंद्र सरकार गांव के उत्थान के लिए वहां पर हर प्रकार की सहूलियत और साधन उपलब्ध कराने के प्रयास कर रही है ,ताकि ग्रामीण लोग शहरों की तरफ पलायन न करें ।परंतु विकास की दर इतनी धीमी है कि अभी गांव में शहरो जैसा विकास होने में बीसीयों वर्ष लग जाएंगे।
गांव से शहर आने वाले लोग शहरों के आकर्षण के कारण यहां खिंचे चले आते हैं। शहरों की चमक दमक उन्हें यहां आने के लिए बाध्य करती है। फिल्म स्टार को देखने, उनकी झलक पाने के लिए, लोग आतुर होकर शहर की ओर चले आते हैं। यहां आकर उन्हें यहां की स्थिति का एहसास होता है। हालांकि शहरों में कोई भूखा नहीं सोता। खाना तो मिल ही जाता है। किंतु सोने के लिए कोई जगह नहीं मिलती। मजबूरन लोगों को फुटपाथ पर सोना पड़ता है। शहरों की दशा यहां की जनसंख्या के कारण बहुत ही खराब है। ट्रेनों में लोगों की भीड़ कम होने का नाम ही नहीं लेती है। इसी भीड़ के कारण कई लोगों को अपनी जान से भी हाथ धोना पड़ता है।
शहरों में लोगों के पलायन से शहरों की दशा अत्यंत खराब हो गई है। दिल्ली शहर इसमें मुख्य है। यहां जनसंख्या अत्यधिक होने से ट्रैफिक प्रदूषण, बीमारियां आदि बहुत बढ़ रही है। इससे पहले कि यहां की हालत विस्फोटक हो जाए, सरकार को कुछ करना होगा।
यह है शहरी जीवन की दशा अथवा दुनिया। जिसे समय रहते सुधारना होगा।
जलते दीपक के प्रकाश में,
अपना जीवन- तिमिर हटाए,
उसकी ज्योतिर्मयी किरणों से,
अपने मन में ज्योति जगाएं।

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