बुधवार, 28 दिसंबर 2022

चांद जरा सा घटता रहा

चांद जरा सा घटता रहा

 

चांद जरा सा घटता रहा ,

अपना सफर तय करता रहा।

रात के अंधेरों में,

अपनी चांदनी के साथ,

बेफिक्र होकर बिखरता रहा।

चांद जरा सा घटता रहा।

चांद जरा सा घटता रहा,

हर पल अपना कर्म करता रहा।

दुनिया को हरदम,

अपने साथ,

मुस्कुराने की प्रेरणा देता रहा।

चांद जरा सा घटता रहा।

चांद जरा सा घटता रहा,

जीवन का अर्थ समझाता रहा।

उसे पता है,

एक दिन पूर्णिमा जरूर आएगी,

तब वह अपनी पूर्णता को पाएगा,

फिर आज वह फिक्र क्यों करें ?

अपने घटने के गम में क्यों मरे ?

चांद जरा सा घटता रहा ।

             राजेश्री गुप्ता

               २८/१२/२०२२


 

 

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